बाल श्रम में घुटता बचपन, परवाह किस समाज को…?

आज समाज में बाल श्रम शब्द से कौन वाकिफ नही है. मगर बात अगर हमारे समाज की करें तो, भारतीय रीतियों और समाज की प्रथाओं के हिसाब से समाज के किसी भी बच्चे को बचपन में भगवान का रुप माना जाता है. लेकिन जब वही बच्चा बाल श्रम जैसे घिनौने कृत की ओर हमारे समाज की ओर से धकेल दिया जाता है, तो क्या उसमें किसी को बचपनें का लड़खपन या भगवान का कोई भी अंश नजर नहीं आता?

सदियों से चली आ रही बाल श्रम की प्रथा में आज तक न जाने कितने बच्चों ने अपने बचपन और लड़खपन को इसमें धकेल दिया. वहीं, जिस समय उनके नन्हें हाथों में किताबें के साथ खिलौनों का भंडार होना था. उसी बचपनें में ही उनके हाथ में प्लेटों की जूठन, फावडों की वजनाई और न जाने ही ऐसे कितने काम….जिन्होनें ऐसे न जाने कितने बच्चों से बचपन नाम का शब्द हटा कर उन्हें जिम्मेदार होने से पहले ही जिम्मेदारी का तमगा दे दिया. जाहिर है, सरकार बाल श्रम को रोकने के लिए न जाने कितने कानून अभी तक पास कर चुकी है और इस दिशा में कार्यरत भी है. लेकिन बाल श्रम की समस्या जस की तस है. साथ-साथ और भी भयावह होती जा रही है.

चाहे जितनी भी सरकारें सत्ता में आये या जाये. बाल श्रम को लेकर चाहे कितने भी वादे घोषणायें कर लें. लेकिन बाल श्रम भारतीय धरातल से खत्म होने का नाम नही ले रहा. पूरे विश्व में सबसे अधिक युवाओं का देश कहा जाने वाले भारत में, आज न जाने कितने युवा ऐसे हैं जो बाल श्रम की गुमनाम सीढ़ीयां चढ़ कर आये हैं. हम अगर खुद अपने घर से निकलते वक्त अपनी गली के नुक्कड़ से लेकर दूर तलक जाती सड़कों के बीच में देखें तो, ऐसे ही न जाने कितने बाल श्रमिक किसी ढाबे पे, किसी दुकान पे काम करते नजर आ जाते हैं. दिनों दिन बढ़ती इस बीमारी में सबसे ज्यादा शिकार गरीब होता है. जो दो वक्त की रोटी कमाने के लिए खुद तो घुटता ही रहता है. साथ में अपने बच्चों को भी इसमें लगा देता है.

अपने बचपन में ही बाल श्रम करने के लिए मजबूर किया गया बच्चा मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक और सामाजिक रुप से भी प्रभावित होता है.

जिसका परिणाम आगे चलकर अपने ही मौलिक अधिकारों से वंचित रह जाना होता है. जोकि संविधान व मानवाधिकार का उल्लंघन है.

1986 में बना बाल श्रम निषेध नियमन अधिनियम, जिसमें बाल श्रम तकनीकी सलाहकार समिति नियुक्त की गई थी. जिसमें कहा गया कि खतरनाक उघोगों में बच्चों की नियुक्ति निषेध है. सविंधान के अनुच्छेद 23 और 24 में मौलिक अधिकारों का हनन अन्याय के विरुध्द बताया गया है. और अनुच्छेद 23 के अंतर्गत कहा गया है कि किसी भी खतरनाक उघोग में बच्चों को रोजगार नही दिया जा सकता. साथ ही संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 साल से कम उम्र के बच्चों को किसी भी फैक्टरी या खदान में रोजगार नही दिया जा सकता. साथ ही 15 से 18 साल तक के बच्चों के लिए किसी भी फैक्टरी में बिना चिकित्सा प्रमाण पत्र के काम करवाना कानूनन जुर्म है. इस कानून में 14 साल से लेकर 18 साल तक के बच्चों के लिए साढ़े चार घंटे की समय सीमा तय की गई है.

लेकिन, यहां बात ये उठती है कि बाल श्रम पर कानूनों का अंबार होने के बावजूद भी बाल श्रम बढ़ क्यों रहा है. पूरे देश में जितने बाल श्रमिक हमारे यहां हैं. इतने किसी और देश में नहीं….जिसके चलते 50 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हो जाते हैं. सरकारी आंकड़ों की मानें तो पूरे भारत में 2 करोड़ बाल मजदूर हैं. वहीं अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक हमारे देश में 5 करोड़ से ज्यादा बाल मजदूर हैं. लेकिन असल सच्चाई से आज हर कोई वाकिफ है. बढ़ती जनसंख्या, सस्ती मजदूरी और शिक्षा का अभाव संविधान में बने कानूनों को ना तो धरातल पर आने दे रहा हैं और ना ही उनके विकास के लिए कुछ कर पा रही हैं.

हमारे देश में सरकार की तरफ से फ्री शिक्षा, फ्री भोजन यहां तक की स्कूलों में ड्रेस तक फ्री में दी जाती है. लेकिन सरकारी स्कूलों की हालत आज देश में रह रहे किसी भी इंसान से छुपी नही है. पैसों के अभाव में कभी कभी तो मां बाप ही थोड़े से पैसों के लिए अपने बच्चों को या तो भीख मांगने पर मजबूर कर देते हैं या तो उन्हें किसी ठेकेदार के हाथों बेंच देते हैं. वहीं वो बच्चे अपनी शारीरिक क्षमता से परे दिनों रात मेहनत करते हैं. जो कुछ समय बाद उनकी दिनचर्या बन जाता है.

बात यहीं खत्म नहीं हो जाती. कभी कभी तो बाल मजदूरों को मेहनत के अलावा यौन शोषण से होकर भी गुजरना पड़ता है. जो किसी भी मासूम के जीवन को जीते जी नर्क बनाने के लिए काफी है.

समाज में रह रहा हर वो तबका जो बाल श्रम को रोकने की बात करता है. वो या तो किसी दफ्तर की चारदीवारी में चुपचाप बैठा हुआ है, या इसको लेकर बहस करने में लगा हुआ है. लेकिन असल धरातल पर कोई भी इस पर काम करने को तैयार नही है. जो बच्चों के उत्थान के लिए सकारात्मक होने के साथ उनके बाल श्रमिक बनने पर रोक लगा सके. महग सरकार की जिम्मेदारी की बात सोचने व कहने वाले लोग. आज समाज में बढ रहे बाल श्रमिकों के सबसे बड़े जिम्मेदार हैं. जो इसे रोकना अपनी नही सरकार की जिम्मेदारी समझकर इसे नजर अंदाज करते हैं. आज देश के हर नागरिक का ये कर्तव्य बनता है कि वो बाल श्रम जैसे मुद्दों पर स्टैण्ड ले और इसको रोकने की दिशा में सकारात्मक कदम बढ़ाये. समाज में पल रहे बाल श्रमिकों को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए. उन्हें आजाद कराये. ताकि हमारे अपने ही बचपन की तरह ही वो बच्चे भी अपने बचपन में बिताये लड़खपन में मीठा एहसास जी सके. क्योंकि देश में आने वाले भविष्य का आधार उन पर ही है. और ऐसे में किसी भी देश का शक्तिशाली, समृध्दि और उज्जवल होने की कल्पना करना महज कल्पना मात्र है.    

 

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