बनियान तो नई ले लूं मगर किसान हूँ ना, फिर पत्नी को सूखी रोटी और दवाई कैसे खिलाऊंगा !

बनियान तो ले लूं नई मगर किसान हूँ ना, फिर पत्नी को सूखी रोटी और दवाई कैसे खिलाऊंगा !

बनियान तो ले लूं नई मगर फिर पत्नी को दवाई कैसे दिलाऊंगा और सूखी रोटी कैसे खाऊंगा !  महोखर,बाँदा: बदन पर फटी बनियान, माथे पर पड़ी चिंता की लकीरें सूखें होंठ और हाथ में फावड़ा ये हैं बांदा सदर के महोखर गांव के रहने वाले बुजुर्ग किसान बद्दन खान। इनके दोनों बेटे इनसे अलग रहते हैं क्योंकि उनकी शादी हो गई है ना, तो क्या बद्दन अपनी बेगम के साथ एक झोपडी में रहते हैं। इस बुजुर्ग किसान के पास तीन बीघा ज़मीन है। ये ईद तो अच्छी मन ना सकी इसी बेपर्द और छितरी हुई बनियान में ही ईद का चांद निकल आया। तो कमसकम आने वाली ईद ख़ुद के लिए ना सही फ़सल के लिए ही अच्छी हो जाए इसलिए बादलों की हलकी सी बुदबुदाहट से ही बद्दन उम्मीद लिए अपने खेत में राख डाल रहे हैं। वैसे बूढ़े शरीर मे अब बनियान न भी हो तो गर्मी जलाती नहीं है बस जलता है तो कलेजा, दुर्दशा देखकर या शायद नहीं क्योंकि देश के बदलते मिजाज में हर आदमी के दिन बदल रहे है।

विकास ने सभी को बेरोजगारी से दूर कर दिया है। किसानों की आय इतनी बेमियाद बढ़ी है कि अब वो कर्ज से आत्महत्या नहीं करते है। उनके उत्पादन में केंद्र सरकार की फसल बीमा योजना और कर्जमाफी का मरहम लगा है। गोबर की खाद कहां से लाएं जब पशु नहीं है पर चलो बुझे हुए चूल्हे की राख तो है। क्या हुआ जो पैरों में चप्पल नहीं तो क्या ज़मीन पर उजड़ी फसल तो है, बदन पर कपड़े नहीं तो क्या सर पर कर्ज का बोझ तो है ठीक से दिखता नहीं तो क्या आँखों में उम्मीद तो है। बाकि सब अच्छा ही है देश में बस किसान ही अच्छा नहीं है।
क्योंकि मैं विकास के सब्जबाग की नजीर हूँ।
मैं किसान हूँ।

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