पिता मेरे… जब किसान कहलाते है।

फादर्स डे

फादर्स डे यानिकी पिता दिवस। इस खास दिन को आपने शहरों में मनाते जरूर देखा होगा। लेकिन गांवों में तो बच्चों और उनके किसान पिता को इस अवसर की भनक भी नहीं होगी। किसान को हमारे देश का अन्नदाता कहा जाता है। जैसे हर घर का अन्नदाता उस घर का पिता होता है। वैसे ही हमारे देश का अन्नदाता भी हमारा पिता है। और इस खास अवसर पर एक कविता हमारे किसान पिताओं के नाम।

फटी कमीज पहनकर, खेतों में जाते है,

पिता मेरें… किसानी करके घर जब आते है।

गर्मी की चिलचिलाती धूप में अपना पसीना बहाते है,

पिता मेरे.. हल चलाकर घर जब आते है।

गोद में उठाकर मुझे फसलों की हरियाली दिखाते है,

पिता मेरे… बिन कुछ कहे सब सहते जाते है।

मुझे पढ़ाने के खातिर खुद मीलों चलकर शहर वो जाते है।

पिता मेरे… नंगे पैर चलकर घर जब आते है।

तरह-तरह की बातें कर मुझको वो खूब हंसातें है।

पिता मेरे.. खुद अपना गम कितने शौक से छुपाते है।

भूख नहीं है, कहकर खुद वो भूखे पेट सो जाते है।

पिता मेरे.. मेहनत करके घर जब आते है।

तकलीफों में मेरी, हमेशा अपना हाथ बढ़ाते है,

पिता मेरे.. हमेशा अपना फर्ज निभाते है।

गलतियों पर डांटकर, मुझे सही राह दिखाते है,

पिता मेरे.. मुझे बहुत कुछ सिखाते है।

मेहनत से अपनी सबकों प्रेरणा दे जाते है।

पिता मेरे.. जब किसान कहलाते है।

 

ग्रामिण न्यूज सभी किसान पिताओं को फादर्स डे की हार्दिक शुभकामनाएं देता है।

हैप्पी फादर्स डे…

 

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