दो दोस्त बस्तियों के बच्चों को दे रहें है, मुफ्त शिक्षा 

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आज कल शिक्षा महंगी हो गई है, जिसके चलते गरीब लोग अपने बच्चों को पढ़ा नही पा रहें, लेकिन पैसे कि वजह से किसी भी बच्चे कि पढ़ाई पर रोक ना लगें. इसके लिए दो दोस्तो शिक्षा की मुहीम शुरु कर दी है, बता दे एक बैंक मैनेजर और एक रेलवे इंजीनियर ने गाजियाबाद की स्लम बस्तियों में बच्चों को शिक्षा दे रहें है. ये दोनों दोस्त हर शाम दो तीन घंटे शिक्षा से दुर बच्चों को  बिना पैसो मे कोचिंग सेंटर खोलकर पढ़ा रहे हैं। जो बच्चे पहले मजदूरी करते थे, कूड़ा बीनते थे अब ये बच्चे इन सेंटरों में आकर पढ़ाई कर रहे हैं, और जिंदगी में कुछ बने की तैयारी कर रहें है.

बैंक मैनेजर तरुणा विधेय और रेलवे में वरिष्ठ खंड अभियंता सुशील कुमार मीणा ये दो ऐसे दोस्त हैं जिन्होंने मुश्किल के दौर को अपने बचपन में देखा था। सही माहौल और उचित शिक्षा न मिलने की वजह से किसी भी बच्चे या युवा की पढ़ाई बाधित न हो इसके लिए ये इन्हें बिना पैसे लिए पढ़ाते हैं, इसके लिए इन्होंने दो शहरों में कुल आठ कोचिंग सेंटर खोले, ये अपने कुछ दूसरे दोस्तों और सेंटर से पढ़े हुए बच्चों की मदद से चला रहे हैं..

गाजियाबाद शहर की कुछ बस्तियों में जहां बिल्डिंग बनाने का काम होता है, वहां काम कर रहे पलायन किए मजदूरों की झुग्गी-झोपड़ी की कई बस्तियां हैं। इन बस्तियों में रहने वाले बच्चे पैसे के अभाव और सही माहौल न मिल पाने की वजह से दिन में कबाड़ बीनते थे या फिर मजदूरी करते थे। इन दोस्तों की पहल से गाजियाबाद की अलग-अलग बस्तियों में सात कोचिंग सेंटर चल रहे हैं जिसमें हर हफ्ते 1752 बच्चे पढ़ाई करते हैं। इसके अलावा एक कोचिंग सेंटर मेरठ जिले में चलता है.

गाजियाबाद के इन्द्रापुरम में रहने वाले 18 वर्ष असलम खान ने कई साल बस्तियों में कबाड़ बीना. अपनी बस्ती में चल रही कोचिंग में चार साल पढ़ाई करने के बाद इस सेंटर के बच्चों को ये पढ़ा रहे हैं. असलम ने बता है कि “दूसरी कक्षा में पढ़ने के बाद कबाड़ बीनने लगा था. जब ये सेंटर खुला तो हमने यहां से पढ़ाई की। अब उतना आने लगा है जितना आठवीं के बच्चों को आता है। अभी पढ़ाई भी करते हैं और अपनी बस्ती के छोटे बच्चों को दो तीन घंटे रोज पढ़ाते भी हैं।” असलम खान की तरह इन कोचिंग सेंटर में पढ़ने वाले 20 बच्चे वालेंटियर हर रोज अपने से छोटे बच्चों को पढ़ाते हैं।

30 साल के तरुणा विधेय मूल रूप से मेरठ के सोतीगंज की रहने वाली हैं। ये गाजियाबाद रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर इंद्रापुरम में रहती हैं और यूनियन बैंक में मैनेजर हैं। ये अभी दो साल की स्टडी लीव पर हैं। इनका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों से ज्यादा बड़ी समस्या शहरों में रहने वाले झुग्गी-झोपड़ी के लोगों की है।

बैंक मैनेजर तरुणा विधेय बताती है कि , “नौकरी के अलावा कुछ अलग, जो अपने मन का हो, ये हर कोई करना चाहता है। हमने कुछ नया नहीं किया है। पढ़ाने की शुरुआत तीन बच्चों से की थी, अब हर दिन सैकड़ों बच्चे पढ़ते हैं। मन को आत्मसंतुष्टि मिलती है। इन्हें पढ़ाई का पूरा सामान मुफ्त में देते हैं जिससे इनकी पढ़ाई चलती रहे।”

तरुणा और सुशील ने वर्ष 2013 से गाजियाबाद की पॉश एरिया में स्लम बस्ती के कुछ बच्चों से पढ़ाने की शुरुआत की थी। जैसे-जैसे बच्चों की संख्या बढ़ी इनके लिए अकेले पढ़ाना मुश्किल हो गया। इन दोनों ने वर्ष 2015 में एक गैर सरकारी संस्था ‘निर्भेद फाउंडेशन’ की शुरुआत की। इस फाउंडेशन के तहत गाजियाबाद और मेरठ मिलाकर आठ कोचिंग सेंटर चल रहे हैं जिसका नाम ‘निर्माण कोचिंग संस्थान’ है।

रेलवे में वरिष्ठ खंड अभियंता के पद पर कार्यरत सुशील कुमार मीणा मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले हैं। इन्होंने अपने आसपास देखा था कि सही गाइडेंस और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिल पाने की वजह से ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को अच्छे मौके नहीं मिल पाते हैं। सुशील ने नौकरी करने के बाद ऐसे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था।

सुशील कुमार बताते हैं, “अगर हम सक्षम हो गए हैं तो इन बच्चों को सक्षम बनाना हमारी जिम्मेदारी है। इन बच्चों को एक बेहतर प्लेटफ़ॉर्म मिले, इसके लिए मैं और मेरे कुछ मित्र जो सरकारी नौकरी करते हैं वो अपने वीकेंड पर इन सेंटरों पर आकर पढ़ाते है।” वो आगे बताते हैं, “मैं और मेरे मित्र अपनी सैलरी के कुछ हिस्से से यहां के सेंटर का खर्चा चलाते हैं। यहां वालेंटियर रेगुलर पढ़ाते रहें इसके लिए उन्हें कुछ पैसे भी देते हैं। जिससे उनका उत्साह बना रहे।”

इन सेंटरों पर तीन साल से लेकर 18 साल तक के बच्चे पढ़ाई करते हैं। इनका सिलेबस उच्च गुणवत्ता का है, यहां की लाइब्रेरी में 10,000 से ज्यादा किताबें है। हर दिन पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 450 है, हफ्ते में वीकेंड पर कुल मिलाकर 1752 बच्चों को पढ़ाया जाता है। हफ्ते में दो दिन इन्हें भोजन और प्रतिदिन दूध के साथ कुछ स्नेक्स दिए जाते हैं। जिससे इनका स्वास्थ्य बेहतर रहे।

सेंटर खोलने से पहले यहां के 2100 बच्चों के साथ सर्वे किया गया, जिसमें ये पता चला कि कितने बच्चे काम करते हैं, कितने ड्राप आउट हैं, कितने बच्चों की पुनः पढ़ने में रूचि है, ये भी पता चला। ये सेंटर गाजियाबाद के पांच एरिया इन्द्रापुरम, विजयनगर, प्रताप बिहार, वैशाली, वसुंधरा में हैं। ये बच्चे अब न सिर्फ इन सेंटरों पर पढ़ाई कर रहे हैं बल्कि जो होशियार बच्चे हैं वो अब इन सेंटरों पर अपने से छोटे बच्चों को पढ़ा भी रहे हैं..

ऐसे लोग अगर दुनियां में सोचने लगे तो, कोई भी व्यक्ति अंपढ़ नही रहेंगा… हर बच्चा पढ़ लिख कर कुछ बन पाएंगा. और देश का नाम रोशन कर पाएंगा..

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