दो कदम अनाज से आगे, किसानों की ओर…तुम कितना भी उगाओ हम सड़ाते रहेंगे. किसानों के मरने का सिलसिला यूं बदस्तूर जारी रहेगा….

किसान

न जाने कितने खोखले सर्वे देश में किसान को लेकर, उनकी उपज पर अब तक आ चुके हैं. हर बार कुछ न कुछ पहले से अधिक बर्बाद हुआ है. अभी हाल ही में आए एक सरकारी अध्ययन में भी ये बात किसी से छिपी नहीं की भारत एक साल में 92 हजार करोड़ रुपये का खाद्य पदार्थ हर साल बर्बाद कर देता है. जितना की ब्रिटेन पूरे साल में उत्पादन करता है.

इस से साफ जाहिर होता है कि हमारे देश में किसान अपनी मेहनत से न तो तब कतराता था और न ही अब कतराता है, कि जब उस पर सवा सौ करोड़ जनता का भार है. लेकिन हमारे नेता अन्नदाताओं के लिए न तो तब कुछ बेहतर करते थे और न ही अब. जिसकी वजह है की हमारे किसान आत्महत्या जैसे घिनौने अपराध तक करने पर विवश हैं.

साल 1979 में शुरु हुआ ‘खाद्यान्न बचाओ’ मिशन, जिसके तहत देश के किसान को सस्ते दामों में भंडारण के लिए टंकियाँ उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था. वो मिशन किस हद तक किसानों के लिए कारगर रहा अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. क्योंकि आज भी अन्नदाताओं का उगाया अनाज बर्बाद हो रहा है.

बात अगर देश में अनाज उत्पादन की करें, तो साल 2016-17 में रिकॉर्ड 27 करोड़ 56 लाख टन की फसल की पैदावर हमारे किसानों ने की. जिस पर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय मंत्री राधा मोहन सिंह ने 2018-19 में भी इसी तरह की पैदावार की उम्मीद जताई. लेकिन क्या फसलों की पैदावार में बढ़ोत्तरी ही हमारी किसानों की परेशानी का हल है ?

अगर हम बात करें भंडारण की तो किसानों को उनके फसलों का उचित मूल्य भंडारण के द्वारा ही संभव है. कभी आसमान की ऊंचाई छूने वाले प्याज और टमाटर को देखे तो पता चलता है कि पिछले साल हुई बंपर पैदावार में मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसान प्याज और टमाटर को मुफ्त में बांटने पर मजबूर हो गये थे. इस से साफ पता चलता है कि भारी उत्पादन होने के बाद भी किसानों को उनकी मेहनत का फल धेला भर नही मिलता है. अगर सरकार के पास उचित भंडारण की व्यवस्था होती तो किसान को उनका सही अधिकार मिल सकता है.

कभी बारिश, तो कभी सूखा इनसे बचने के बाद पैदा हुआ अनाज मंडी में पहुंचने के बाद भी सुरक्षित नहीं है, इसकी गांरटी न तो सरकार देती है और न ही किसान इसे खुद सुरक्षित कर सकता है. हर साल बारिश के मौसम में समाचार पत्र, टी.वी ना जाने कितनी खबरें बारिश की वजह से फसल खराब होने को कवर करती हैं, और अगले दिन किसी चटपटी खबरों के चक्कर में उसे भूल जाती है. बारिश अपने समय पर आती है, और मंडियों में बाहर पड़े अनाजों पर अपनी बूदों से गेंहू के दानों को अकुंरित कर देती है. लेकिन ये समाचार पत्र, टी.वी कभी सरकार से ये नहीं पूछते की किसान की उपज को रखने के लिए भंडारण कहां है. कोई ये नही पूछता की पिछले साल का कितना अनाज अभी तक जस का तस मंडियों में पड़ा है.

कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा है कि क़ृषि उत्पादों के भंडारण के लिए तेजी से काम किया जा रहा है. भारत शीत भंडारण क्षमता स्थापित करने वाला देश भी बन गया है. इस समय भारत की शीत भंडारण क्षमता 3 करोड़ 20 लाख टन है. जिसके अंतर्गत पिछले 2 सालों में शीत भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए ढाई सौ परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया है.

भारत सरकार के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नालॉजी के मुताबिक फसलों की ज्याजा पैदावार और उचित भंडारण की कमी ने देश में खाद्यान्न की बर्बादी को बढ़ाया है। 92 हजार करोड़ रुपए का खाद्य पदार्थ हर साल बर्बाद करने वाले भारत का 40 फीसदी फसल तो खेतों में ही नष्ट हो जाती है. जिसकी जिम्मेदारी ना तो सरकार लेती है और ना ही किसान. जाहिर है की मूलभूत ढांचा और सरकार का गैर जिम्मेदाराना रवैया अन्नदाताओं को भुखमरी, लाचारी जैसे जीवन जीने को मजबूर करती है.

उद्योग मंडल एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने एक अध्ययन के मुताबिक बताया है कि देश भर में कुल 6300 कोल्ड स्टोरेज हैं. जिनकी भंडारण क्षमता 3.1 करोड़ टन है. जिसमें महज 11 प्रतिशत जल्दी खराब होने वाली फसलों का भंडारण हो पाता है.

जोकि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब तक ही सीमित है. साल 2016 में शीत भंडारण बाजार का मूल्य 167.24 अरब डॉलर आंका गया था और साल 2020 तक 234.49 अरब डॉलर होने की उम्मीद है.

पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से शीत भंडार श्रृंखला का बाजार निरंतर बढ़ा है और साल 2020 तक इसी तरह रहने की उम्मीद है। इस से जहां एक तरफ ये जाहिर होता है कि फसलों की पैदावार निरंतर बढ़ रही है. ठीक उसी प्रकार “पर्याप्त आधारभूत ढांचे की कमी, और प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव, व पुरानी पड़ चुकी विधुतीय आपूर्ति हमारे देश में शीत भंडारण के आधारभूत ढांचें के विकास में महत्वपर्ण बाधाएं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने लिया मामले में संज्ञान

हर साल भंडारण में खामियों के चलते ही लाखों टन अनाज बाहर पड़े पड़े सड़ जाते हैं. जिसको संज्ञान में लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. साथ ही यह भी कहा है की अगर आपसे भंडारण का सही प्रबंध नहीं होता है तो क्यों नहीं अनाज को गरीबों में मुफ्त में बांट दिया जाये.

उद्योग मंडल एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने एक अध्ययन के मुताबिक कहा है कि पंजाब में पिछले कुछ सालों के दौरान 16 हजार 500 टन अनाज सड़ चुका है. इसी तरह मध्य प्रदेश में 157 लाख टन अनाज सड़ चुका है. जिसकी अनुमानित राशि 5 हजार करोड़ रुपए आंकी गई है. जिसमें 54 लाख टन गेंहू और 103 लाख टन चावल शामिल था.

हाल ही में नई दिल्ली में एक कार्यक्रम में शामिल खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री राम विलास पासवान ने बताया की “देश में आधुनिक भंडारण को बढ़ाने के लिए 100 लाख टन के स्टील साइलो बनाने के लिए जोरों से काम चल रहा है. साल 2020 तक इसे पूरा कर लिया जायेगा. लेकिन बात यहां ये उठती है की आखिर कब तक किसान यूं ही खेत में अपनी फसलों को उगा कर बेबस होता रहेगा. कब तक अपनी फसलों के वाजिब दाम के लिए तरसता रहेगा….?

 

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