देश विभाजन पर बोले दलाई लामा, अगर नेहरू की जगह जिन्ना होते PM तो नहीं होता देश का विभाजन

देश विभाजन

तिब्बती बौद्ध धर्मगुरू दलाई लामा ने देश विभाजन पर गोवा के इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के एक कार्यक्रम में कहा की, अगर उस समय भारत का प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की जगह जिन्ना को बनाया जाता तो भारत कभी विभाजित नहीं होता. द इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक उन्होनें कहा की, “महात्मा गांधी, उस दौरान जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे. मगर नेहरू नहीं माने. वो इस फैसले को लेकर आत्मकेंद्रित थे.” उन्होनें कहा की, ‘नेहरू ने कहा था की वो खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे. लेकिन अगर भारत का प्रधानमंत्री जिन्ना को बनाया जाता तो भारत और पाकिस्तान का कभी विभाजन नहीं होता.’

इस कार्यक्रम के दौरान एक छात्रा द्वारा जब यह पूछा कि कोई किस तरह के निर्णय ले कि उससे कभी गलतियां ना हो? इस पर दलाई लामा ने कहा की, ‘गलतियां सबसे होती हैं.’ दलाई लामा सखाली स्थित इंस्टीट्यूट के कैंपस में आधुनिक समय में परंपरागत भारतीय ज्ञान के महत्व संबंधी विषय पर अपने विचार देने आये थे. यह इंस्टीट्यूट अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है. इस मौके पर यहां धर्मगुरू दलाई लामा को लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया गया था. वहीं  सात साल बाद दलाई लामा ने गोवा में लेक्चर दिया है.

इस लेक्चर के कुछ समय पहले ही धर्मगुरू दलाई लामा ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में कहा था की, ‘प्राचीन भारतीय परंपराओं का पुनरूद्धार करने के लिए, आधुनिक शिक्षा प्रणाली में प्राचीन भारतीय परंपराओं को एकीकृत करने के लिए दलाई लामा ने आह्वान किया था. इसके अलावा उन्होनें कहा था की इससे युद्ध और ग्लोबल वार्मिंग जैसे मुद्दों से भी निपटने में आसानी होगी.

गोवा में अपने कार्यक्रम में दलाई लामा वैश्विक शांति और सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए नैतिकता और संस्कृति की भूमिका का व्याख्यान कर रहे थे. इस कार्यक्रम का आयोजन नेहरू स्मारक संग्रहालय, पुस्तकालय और 1978 में स्थापित गैर-राजनीतिक संगठन अंतर-राष्ट्रीय साहित्य परिषद ने किया था. इस कार्यक्रम के दौरान दलाई लामा ने कहा था की, “शैक्षणिक प्रणाली में प्राचीन भारतीय परंपराओं को शामिल करने के लिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली में चर्चा करनी चाहिए. इससे विश्व की समस्याओं के हल में मदद मिलेगी. आधुनिक शिक्षा और प्राचीन परंपराओं को जोड़ने से भारत की योग्यता बढ़ेगी.”

इसके साथ उन्होनें कहा था कि, ‘भारतीय सभ्यता की महानता उसका आध्यात्मिक भाईचारा और सद्भाव है.’ इसके अलावा उन्होनें कहा की भारत महान दार्शनिकों और उपदेशकों की जननी रही है. जिनकी वजह से ही हमारी बौद्ध धर्म की नालंदा परंपरा आगे बढ़ी है. आज नालंदा अपने  बौद्ध स्थलों और स्मारकों के लिए मशहूर है. नालंदा विश्वविघालय भारत में सबसे प्राचीन और मध्ययुगीन में समय में ज्ञान  का बौद्ध केंद्र था. जहां मध्य एशिया, तिब्बत और चीन के छात्र शिक्षण लेने के लिए आते थे .

 

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