डायन प्रथा के नाम पर देश की गोल्ड मेडलिस्ट को मछली के जाल में बांधकर पीटा

डायन प्रथा

डायन प्रथा को भले ही देश में बैन कर दिया गया हो। लेकिन आज भी देश के कई गांवों और विशेष समुदायों के बीच इस प्रथा का चलन जिंदा है। कुछ सालों पहले की ही बात है। जब असम के कारबी एंगलौंग गांव नाम के गांव में एक महिला को डायन घोषित कर बहुत पीटा गया था। ये बात है साल 2014 की जब असम के इस गांव में कई लोगों की अचानक एक के बाद एक मौतें होने लगी। गांव के बुजुर्गों ने इन मौतों के पीछे किसी डायन का हाथ होने की बात कही। औऱ फिर क्या था। गांव में डायन का पता लगाने के लिए गांववासियों की सभी बुलाई गई।

सभा में एक बुजुर्ग महिला ने देबोजानी की तरफ इशारा किया। और चिल्ला कर कहा, कि ‘यही है, डायन इसे सजा दो’। उस महिला के बस इतना कह देने के बाद ही, गांव के लोगों ने देबोजानी को घेर लिया। औऱ मछली पकड़ने वाले जाल में बांध कर उसे इतना पीटा गया। कि वो जब तक अधमरी हालत में नहीं पहुंच गई। तब तक उसे मारा गया।

डायन प्रथा जैसे अंधविश्वास की आड़ में महिलाओं को बेरहमी से लेकर बदसलूकी तक का सफर तय करना पड़ रहा है। कानूनी रूप से अपराध होने के बावजूद भी देश के कई इलाकों में जिंदा है, डायन प्रथा ।

आपकों शायद ये नहीं पता होगा। कि जिस देबोजानी बोरा को गांव के लोगों ने डायन घोषित कर मारा था। वो देश की gold medalist रह चुकी है। 51 साल की देबोजानी 3 बच्चों की मां थी। और बचपन से इसी गांव में पली-बढी थी। खेतों में काम करने के साथ-साथ उन्होने ऐथलैटिक्स की प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया। उन्होंने बहुत से नैशनल मीट्स में असम का प्रतिनिधित्व किया था. भारत के लिए 2011 में जैवलीन थ्रो में गोल्ड मैडल भी जीता था।

सिर्फ असम ही नहीं देश में कई औऱ भी ऐसे पिछड़े इलाके है। जहां ओझाओं, तांत्रिकों के कहने पर किसी भी महिला को डायन करार दिया जाता है। कई जगह डायन घोषित कर महिलाओं को खींच कर भीड़ के सामने लाया जाता है। और फिर उसे सबके सामने नंगा कर मारा-पीटा जाता है। तो कहीं उस का सिर मुंडवा कर और चेहरे पर कालिख पोत कर पूरे गांव में भी घुमाया जाता है। चाकू, कीले सूईयां तक महिलाओं के शरीर में घोप दी जाती है। औऱ इतना सब होने के बाद भी बदकिस्मती से अगर महिला बच जाती है। तो उस गांव से बाहर कर दिया जाता है। और कई बार तो गांव से बाहर की गई महिला के साथ हैवानियत के दरिंदे बालात्कार भी करते है।

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के हाल के डाटा के मुताबिक डायन हत्या के नाम पर 2000 से 2012 के बीच करीब 2,097 लोगों की हत्या की गई है।  जिन में से 363 मामले अकेले झारखंड से थे। जबकि, पिछले पांच सालों में असम में कुल 400 मामले सामने आ चुके है। सोचने वाली बात यह है। कि सिर्फ भारत में ही नहीं,  बल्कि दूसरे देशों में भी ऐसे मामले बखूबी पाए जाते हैं। मसलन, तंजानिया, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, इंगलैंड जैसे देशों में भी यह प्रपंच रचा जाता है।

और औरतों को डायन घोषित करने के पीछे अक्सर लोगों को अपना स्वार्थ छुपा होता है। जैसे अगर किसी एक व्यक्ति की बस 3 बेटियां हैं।  तो उस की सारी संपत्ति बेटियों के नाम ही हो जाएगी। लेकिन जब बात योजनाओं का लाभ उठाने की होती है। तो यही बात अभिशाप बन जाती है। और उसी के घर को कोई सदस्य बेटियों को डायन घोषित कर संपत्ति हड़पने की साजिश रच लेता है।

कई बार तो ऐसा भी होता है। जब घर का ही कोई सदस्य महिला पर गलत नजर रखता है। लेकिन महिला उसके झांसे में नहीं आती है। तो बदला लेने की इच्छा से मौका मिलते ही वो उस महिला को डायन के रूप में प्रचारित कर अपना बदला पूरा कर लेता है।

इन इलाकों में आमतौर पर मुखिया और पुजारी ही ऐसे शख्स होते हैं। जिन की बात पर गांव का हर सदस्य भरोसा करता है। और इन दोनों को ही कोई भी रुपयों का लालच देकर अपने वश में कर सकता है। सिर्फ रूपयों के लालच में आकर ये पुजारी औऱ मुखिया किसी भी औरत को डायन घोषित कर उसकी जिंदगी से खिलवाड़ करते है।

हालांकि, कहने को तो सरकार इस मामले में कानून द्वारा लगाम कसने के प्रयास करती रही है। छत्तीसगढ़ का टोनही प्रताड़ना निवारण ऐक्ट ऑफ 2005, बिहार का प्रिवैंशन औफ विच प्रैक्टिसेज ऐक्ट (1999) और विचक्राफ्ट प्रिवैंशन ऐक्ट 2001 इन सारे कानूनों के अंदर डायन के नाम पर प्रताडि़त और बेइज्जत करने वालों के लिए कठोर कानूनों का प्रावधान है। लेकिन बावजूद इसके ये कूप्रथाएं चल रही है।

समाज सेविका और वूमन पौलिटिकल फोरम की फाउंडर मैंबर संध्या सिन्हा कहती हैं। कि ‘‘औरत की सब से बड़ी दुश्मन उस की खामोशी है। वह स्वयं तो अत्याचार का विरोध नहीं करती है। किसी और के साथ गलत हो रहा हो तो भी उस के विरुद्घ आवाज नहीं उठाती है। उस में गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं है। उसे डर रहता है। कि साथ देने के आरोप में उस के साथ भी मारपीट की जाएगी। वह संस्कार के नाम पर चुप रह जाती है। उसे यह नहीं पता है। कि संस्कार और अंधविश्वास के बीच फर्क होता है। जिस दिन औरत यह बात समझ जाएगी। उस की स्थिति भी सुधर जाएगी। हमारे देश में हर समस्या से जुड़े कानून हैं।  जो महिलाओं की मदद के लिए बनाए गए हैं। बस अगर किसी की जरूरत है। तो वो है औरतों के बीच जागरूकता की।

 

Grameen News के खबरों को Video रूप मे देखने के लिए ग्रामीण न्यूज़ के YouTube Channel को Subscribe करना ना भूले  ::

https://www.youtube.com/channel/UCPoP0VzRh0g50ZqDMGqv7OQ

Kisan और खेती से जुड़ी हर खबर देखने के लिए Green TV India को Subscribe करना ना भूले ::

https://www.youtube.com/user/Greentvindia1

Green TV India की Website Visit करें :: http://www.greentvindia.com/

 

0 Comments

Leave a Comment

Login

Welcome! Login in to your account

Remember me Lost your password?

Lost Password