गोलाबारी से परेशान इस गांव के लोगों की नहीं सुन रही सरकार

गोलाबारी

देश के लगभग सभी शहर और गांव में रहने वाले लोग सरकार और हमारे जवानों के होते हुए चैन और सुकून की जिंदगी बिता रहे है। लेकिन सीमा के नजदीक बसे उस गांवों की परवाह किसी ने नहीं की। जिसे आये दिन किसी ना किसी तरह की मुश्किलों से गुजरना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांवों को कभी कुदरत के कहर का सामना करना पड़ता है। तो कभी पाकिस्तान की गोलाबारी का। यहां के लोगो की परेशानियां कम होने का नाम ही नहीं ले रही है।

आपको बता दें, कि बॉर्डर की सीमा पर बसा कमोर एक छोटा सा गांव है। जहां बसंतर नदी बहती है। इस गांव के लोग काफी वक्त से कई मुश्किलों से झूझ रहे है। गांव के लगभग सभी लोग परिवार सहित घर छोड़ने पर मजबूर हो गए है। उनके पास घर का खर्च चलाने के लिए ना तो पैसे बचे है। और ना ही पैसे कमाने का कोई जरिया।

अपना घर छोड़कर आश्रम में रह रहे 82 साल के एक बुजुर्ग का कहना है, कि उनकी कमाई का एकमात्र साधन खेतीबाड़ी है। और साल 2014 में आई बाढ़ के कारण उनकी 45 कनाल की जमीन भी बह गई। अब उनके पास सिर्फ चार कनाल जगह ही खेती के लिए बची है। लेकिन उसमें भी गोलाबारी के कारण खेती नहीं हो पाती है। इतना ही नहीं, इस गांव के किसानों को किसी भी नुकसान का कोई मुआवजा तक नहीं मिल रहा है। कोई भी इस गांव की हालत के बारे में नहीं सोच रहा है।

हालांकि, इस गांव के कई लोग कैंप में रह रहे हैं। बसंतर में आई बाढ़ के कारण कई लोगों के खेत बह गए थे। बहुत नुकसान हुआ था। मगर किसी ने सहायता नहीं की। कई किसानों की जमीन सीमा सुरक्षा बल क्षेत्र में आने की वजह से उन पर तारें बिछा दी गई है। लेकिन किसानों को इसका मुआवजा तक नहीं दिया जा रहा है।

इस गांव के किसान जगदीश शर्मा ने बताया, कि पहले वो खेती करते थे। मगर जब जमीनें ही नहीं रही। तो उन्होंने अपनी दुकान खोल ली। लेकिन उन्हें ये भी पाकिस्तान की गोलाबारी के कारण बंद करनी है। सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की शिकायतें हैं। कि उनकी समस्याओं को कोई नहीं सुनता। अगर सरकार उन्हें मूलभूत सुविधाएं नहीं दे पाती है तो कम से कम उनकी जमीनों का मुआवजा ही दिया जाए।

पाकिस्तान की गोलाबारी के कारण इस गांव के लोग ठंडी खुई स्थित राधास्वामी आश्रम में रुके हुए हैं। आश्रम से ही सैकड़ों लोगों को खाने से लेकर ठहरने और स्वास्थ्य की सुविधाएं दी जा रही हैं।

जामकारी के अनुसार, नेता और अधिकारी यहां आते तो हैं। लेकिन फोटो खिंचवाकर चले जाते है। और लोगों को सिर्फ आश्वासन के सिवा कुछ नहीं देते। लोगों में प्रशासन और सरकार के के लिए गुस्सा भरा हुआ है। साथ ही, अगर ऐसे ही गोलाबारी होती रही और सरकार ने उनकी समस्याओं को नहीं सुना तो वो गांववासी खेतीबाड़ी छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

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