ये गांव बना मिसाल : बेटी पैदा होने पर पिपलंत्री में लगाए जाते है 111 पौधें

ये गांव बना मिसाल

समाज में कई तरह की परंपरा हम देखते और सुनते आ रहें हैं। कुछ पंरपरा अच्छी होती हैं। तो कुछ पंरपरा दिल देहला देती हैं। लेकिन आज हम आपको एक ऐसी पंरपरा के बारे में बता रहें हैं। जिसके बारे में सुनकर इस गांव की वाह वाही करेंगा। ये एक ऐसी पंरपरा हैं जिसमें लड़कियों के पैदा होने पर पेड़ लगते हैं।

घरों में बच्चें पैदा होने पर उससे सम्बन्धित कुछ-न-कुछ मान्यताएं होती हैं, जैसे कि गीत का गाया जाना, या फ़िर तुरंत जन्मे बच्चों को पिता या मां के पुराने कपड़े पहनाना, कई रीति रिवाज़ होते हैं, जिन्हें हम सही से जानते भी नही हैं। मगर राजस्थान का पिपलंत्री गांव में बच्चें के पैदा होने पर अलग सी पंरपरा का रिवाज हैं, जिसे हर किसी को निभाना होता हैं। यहां बच्ची के जन्म पर 111 पेड़ लगाए जाते हैं.

हमारा समाज और देश ऐसा हैं जहां लड़कियों के पैदा होने पर उन्हें भार समझा जाता हैं , जहां आज भी लड़कियों को दहेज के लिए जला दिया जाता हो,  जहां कोख में ही लड़कियों को मार दिया जाता हैं, बेटे के सामने लड़की को दबा दिया जाता हैं, और ऐसे ही समाज में ऐसी परम्परा का होना बेहद खुशी की बात हैं। की धरती पर ऐसे लोग भी हैं जो बेटी को जन्म पर खुश होते हैं।

इस अद्भुत परम्परा की शुरुआत श्याम सुंदर पालिवाल नामक एक ग्रामीण नेता के द्वारा की गई थी, जब उनकी पुत्री कम उम्र में ही चल बसी थी. और आज भी ये परंपरा जारी है.आज भी जब इस गांव मे कोई लड़की पैदा होती है तो, गांव के सदस्य एक ट्रस्ट के तहत एक निवेश खड़ा करते हैं जिसका एक तिहाई हिस्सा 31,000 रुपये लड़की के माता-पिता को जमा करने होते हैं

ट्रस्ट के बदले माता -पिता को एक एफिडेविट कराना पड़ता है, जिसमें माता-पिता को ये घोषित करना पड़ता है कि वे 18 वर्ष से पहले अपनी बेटी की शादी कतई नहीं करेंगे. साथ ही उन 111 पेड़ों के देखभाल की शर्त भी उसी में शामिल होती है. ये सुनने में भले ही छोटी बात लग रही हो मगर ऐसी बातें ही समाज बनाती हैं और इनका असर समय से परे होता है.

आखिरकार कहीं भी रहने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ तो वहां का वातावरण ही होता है न! ये खूबसूरत परंपरा महिलाओं के लिए एक विश्वास का माहौल खड़ा करती है.वहां के लोगो का कहना हैं कि इन पौधों की देखभाल करने का अहसास ठीक वैसा ही है जैसे कि आप अपने बच्चों को थपकी देकर सुला रहे हों.

ये सारे पेड़ वहां रह रहे लोगों के लगाए हुए है, और इन्हें बचाने के लिए वे इन पेड़ों के इर्द-गिर्द एलोवेरा लगाते हैं ताकि पेड़ों को दीमक से बचाया जा सके. पिछले 6 वर्षों में यहां लगभग ढाई लाख पेड़ लगे हैं.

इससे गांव का माहौल कुछ ऐसा हो गया है, कि जैसे ये स्वर्ग हो. यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि इन सारी सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए वातावरण की तरफ देखना ही होगा, और जब ये पौधे पेड़ के रूप में विकसित होंगे तो ही उसे उपलब्धि कहा जा सकेगा.

एक ये पंरपरा हैं जिसके बारे में सुनकर हमें भी लगने लगा हैं की अगर यह पंरपरा हर गांव में शुरु हो जाए तो देश की तस्वीर को बदलने में समय नही लगेंगा। और एक तरफ ऐसी पंरपरा हैं जिसके बारे में भी सुनकर हमारे होश उड़ जाते हैं। गांव वालो की यह पंरपरा हमें तो बेहद पंसद आई। हर कोई चाएगा की ऐसी पंरपरो से अपना गांव माना जाए.

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