मुसहरों की जिंदगी: अपनी भूख से नहीं बच्चों की भूख से बेबस है मुसहरों की जिंदगी

मुसहरों की जिंदगी

मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश): कहते हैं भूख हर इंसान को लगती है, कोई महलों में रहकर आलीशान खाना खाता है, तो कोई सामान्य. लेकिन दुनिया में ऐसे ना जाने कितने लोगों हैं, जो भूखे पेट सो रहने के आदि हो गए हैं. हाल ही में भूख से हुई तीन बच्चियों की मौत ने जहां एक बार फिर लोगों को ये बता दिया कि भूख से आज भी लोगों की मौत होती है. अगर बात करें देश की तो यहां ऐसे ना जाने कितने लोग हैं जो हर रोज भूखे पेट सोने को मजबूर होते हैं. ऐसे में तीनों बच्चियों की भूख से हुई मौत ने एक बार फिर लोगों को एहसास दिला दिया की भूख किसी की जिंदगी ले सकती है. हमारे देश में कई ऐसे इलाके और बस्तियां हैं जहां लोग हर दिन भर पेट खाना नहीं खाते. क्योंकि ना तो उनके पास भोजन होता है और ना ही आय का जरिया.

इसी तरह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में रह रहे मुसहरों की जिंदगी है. जहां रह रहे 2-3 बच्चियों को नहीं बल्कि पूरी बस्ती को ही भरपेट खाना नहीं मिलता. यकीनन इस पर यकीन करना थोड़ा मश्किल सा लगता है. लेकिन ये बात सच है. इस बस्ती में अगर कोई बच्चा भूख से परेशान होकर मां से रोटी मांगता है तो बेबस मां उसे शाम तक इंतजार करने को कहती है. क्योंकि अधिकांश दिन इन घरों में खाने को कुछ नहीं होता है. अगर जो थोड़ा खाना या कुछ खाद्य पदार्थ घर में होता है, तो मां उसे शाम के लिए रख लेती है.

ऐसे में मुसहरों की जिंदगी हर दिन ऐसी ही गुजरती है. आज उत्तर प्रदेश का ये जिला खनन, दरी, चीनी के लिए जाना जाता है, लेकिन लोग मुसहरों की जिंदगी के बारे में नहीं जानते. लेकिन इस जिले में मुसहरों की बहुत बड़ी आबादी रहती है. मुसहरों के बारे में कहा जाता है कि वो चूहे खाते हैं. मुसहर, यूपी, बिहार, झारखंड में भी रहते हैं. मुसहरों की जिंदगी आम लोगों की जिंदगी से बिल्कुल कटी हुई होती है. मिर्जापुर के हथिया फाटक के पास बसा ये गांव मुसहरना, जिसके लोगों अपने जीवन को चलाने के लिए और दो वक्त की रोटी के लिए जंगलों में से पेड़ की पत्तियां तोड़कर उसके पत्तल बनाते हैं. भले ही इसको करने में इन लोगों की अथाह मेहनत लगती हो. लेकिन जब वो पत्तल बाजार में बेचने आते हैं तो उनको अपने पत्तल का इतना पैसा भी नहीं मिलता. जिससे उनके घर की जरूरतें पूरी हो सके. आज इक्कीसवीं सदी चल रही है. लेकिन मुसहरों को अछूत माना जाता है. यहां के बच्चे भी पढ़ना चाहते हैं, लेकिन ये बच्चे और लोगों के बच्चों के बीच शामिल नहीं किये जाते. क्योंकि ये अछूत माने जाते हैं. इसी अछूत के कारण ही इस गांव के लोगों को कोई अपने यहां काम पर भी नहीं रखता है. जिसकी वजह से मुसहरों को पत्तल बनाकर जीवनयापन करना पड़ता है.

 

Grameen News के खबरों को Video रूप मे देखने के लिए ग्रामीण न्यूज़ के YouTube Channel को Subscribe करना ना भूले  ::

https://www.youtube.com/channel/UCPoP0VzRh0g50ZqDMGqv7OQ

Kisan और खेती से जुड़ी हर खबर देखने के लिए Green TV India को Subscribe करना ना भूले ::

https://www.youtube.com/user/Greentvindia1

Green TV India की Website Visit करें :: http://www.greentvindia.com/

 

 

 

0 Comments

Leave a Comment

Login

Welcome! Login in to your account

Remember me Lost your password?

Lost Password