गांवों में विकास की असल हकीकत- खुली बैठकें सरकारी दफ्तरों तक ही सीमित

गांवों में विकास

देश में किसानों की दोगुनी आय और किसानों को बेहतर भविष्य देने के लिए न जाने कितने काम सरकार कर रही है साथ हीअनेकों वादे भी कर रही है. इसी तरह गांवों के विकास के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी स्मार्ट सिटी की ही तर्ज पर गांवों को स्मार्ट बनाने की बात की थी. जिसके लिए गांवों की ग्राम सभा को गांव के विकास के लिए अहम कड़ी बताया था. इस संदर्भ में बाराबंकी के जिलाधिकारी उदयभान त्रिपाठी के मुताबिक, “किसान और गांव में रह रहे लोग अभी इतने जागरुक नहीं है, की वो अपने जिम्मेदारी को बेहतर तरीके से निर्वाहन कर सकें. या सरकार द्वारा जारी की गई स्कीमों का लाभ उठा सकें.”

जाहिर है, किसानों को उनकी फसल की दुगनी आय देने और गांवों से गरीबी हटाने के लिए सरकार प्रयासरत है. लेकिन सरकारों की स्कीमों से लेकर जारी दिशा निर्देष धरातल पर किसानों तक किस हद तक पहुंच पाते हैं, इससे तो सब वाकिफ हैं. जानकारी के अभाव में कभी किसान खुद आगे नहीं आ पाता, तो कभी किसानों के हिस्से वो खा जाते हैं. जिन्हें किसानों के हक के लिए बैठाया गया है.

गोरखपुर के विकास खंड के एक ग्रामीण महेश (41) के अनुसार, “ग्राम पंचायतों से लेकर उच्चस्तरीय बैठकों में भेदभाव होता है. वहीं बड़े लोगों की मनमर्जी के हिसाब से इन बैठकों का चलाया जाता है. साथ ही लोगों को भ्रमित किया जाता है.”

बात साफ है, जहां एक तरफ सरकार गांवों के विकास के लिए खुली बैठकों और ग्राम पंचायतों को बढावा देना चाहती है. वहीं खुली बैठक के नाम पर अधिकारी बैठकों को एक कमरे में चंद लोगों की मौजूदगी में ही पूरा कर लेते हैं. इनकी जानकारी तक लोगों को नहीं दी जाती. इन बैठकों में विशेष लोग ही होते हैं. यही गांवों की विकास योजना तैयार करते हैं.

वहीं एक और ग्रामीण की मानें तो गांव के विकास के लिए सबसे जिम्मेदार व्यक्ति गांव का प्रधान होता है. लेकिन प्रधान भी गांवों में खुली बैठक नहीं कराता. खुद ही कार्यों की योजनाएं बना लेता है. और सरकार से लाभ उठाता है.

गाँवों के विकास कार्यों की प्राथमिकता के लिए ही गाँवों में खुली बैठकों को बनाया गया है. लेकिन खुली बैठकों की असल हकीकत महज कागजों में ही सीमित है. बड़े अधिकारी और बड़े लोग आपसी मिलीभगत से कार्ययोजनाओं पर सरकार से पैसे स्वीकृत कराते हैं. आपस में बांट लेते हैं. लेकिन ग्रामीणों के हक के लिए कोई बात नही करता.

यहां तक गांवों का आलम ये है कि गाँव के लोग अभी खुली बैठक क्या होती है? कैसे होती है ये भी नहीं जानते. ना ही गांव के सरपंच या प्रधान लोगो को इसकी जानकारी देते हैं. नियमों के हिसाब से खुली बैठक साल मे दो बार (रबी और खरीफ की फसलों की कटाई के बाद)

होनी अनिवार्य है. वहीं बैठक की सूचना लोगों तक 15 दिन पहले ही पहुंच जानी चाहिए. बैठक को बुलाने और उसको करने का अधिकार केवल गांव के प्रधान को होती है.

हमारे देश में 2.5 लाख पंचायतें हैं, जिसमें 57 हजार पंचायतें केवल उत्तर प्रदेश में उपस्थित हैं. लेकिन फिर भी ग्रामीण विकास मंत्रालय की टॉप 10 की सूची में यूपी प्रदेश की एक भी ग्रामीण पंचायत शामिल नही है. इस सर्वे में जहां गाँव में हुए विकास कार्यों और पंचायतों की कार्यशैली को देखकर सर्वे किया जाता है. वहीं ये प्रदेश के लिए कॉफी शर्म की बात है कि प्रदेश में सबसे ज्यादा ग्राम पंचायतें होने के बावजूद कोई भी पंचायत इस लिस्ट में शामिल नही है.

एक विधान ये भी है कि, अगर प्रधान बैठक को आयोजित नहीं करता है या बैठक आयोजित करने में असमर्थ है तो, पंचायती राज अधिकारी या क्षेत्र पंचायत, प्रधान की बैठक की तारीख के 60 दिनों के भीतर बैठक आयोजित करवा सकते हैं.

इसके बाद भी अगर गांव का प्रधान बैठक आयोजित नहीं करता है, तो गांव के लोग प्रधान की शिकायत बीडीओ या सीधे तौर पर जिलाधिकारी से कर सकते हैं.

इतने प्रावधान हमारी सरकार की तरफ से खुली बैठकों को आयोजित करने के लिए है. लेकिन ना तो अधिकारी, ना ही गांव का प्रधान और ना ही सरपंच इस पर रुचि रखते हैं. जिसके चलते गांव के किसान सरकार की तरफ से लागू स्कीमों से वंचित रह जाता है. और हमेशा की तरह ही जिल्लत और परेशानियों भरी जिंदगी जीने पर मजबूर होते रहते हैं. निश्चित ही हमारी सरकार को इस पर कड़े फैसले लेने की जरूरत है. जिससे समाज के अधिकारियों से लेकर गांवों में रह रहे प्रधानों की मनमानी को बंद कराया जा सके.

 

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