क्या वाक़ई ‘मनहूस’ है नोएडा : आख़िर क्यों यहां आने के बाद चली जाती है मुख्यमंत्रियों की कुर्सी !

मुख्यमंत्रियों के लिए मनहूस नोएडा
ज़्यादातर तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के लिए ‘मनहूस’ माना जाने वाला नोएडा सीएम योगी के लिए मनहूस नहीं है। शायद तभी तो सीएम योगी आदित्यनाथ 6 बार नोएडा आ चुके हैं और अरबों की योजनाओं का उद्घाटन-शुभारंभ कर चुके हैं, लेकिन न तो उनकी कुर्सी पर फर्क पड़ा और न कुछ बुरा हुआ। खैर योगी तो इस अन्धविश्वास से नहीं डरे मगर नोएडा से जुड़ा कौनसा अन्धविश्वास है और बाकि के सभी सीएम क्यों नोएडा आने से डरते थे। आइए हम आपको बताते हैं। 

मुख्यमंत्रियों के लिए मनहूस नोएडा : दरअसल नोएडा के बारे में ऐसा माना जाता था कि अगर कोई सीएम नोएडा आ जाए तो उसकी कुर्सी चली जाती है। ये डर पिछले 30 साल से भी ज़्यादा समय से है। खासतौर से बसपा और सपा के शासन के दौरान इस तरह का अंधविश्वास फैलाया जाता रहा है कि यूपी के मुख्यमंत्री का नोएडा आना अशुभ है। ऐसे में कोई सीएम नोएडा आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और जो आया भी वो उसकी कुर्सी चली गई।

विश्वनाथ प्रताप सिंह
1982 में तत्कालीन यूपी के सीएम विश्वनाथ प्रताप सिंह नोएडा में वीवी गिरी श्रम संस्थान का उद्घाटन करने आए थे। उसके बाद वो मुख्यमंत्री पद से हट गए। हालांकि, ये अलग बात है कि वो बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने।
वीर बहादुर सिंह
बात 1988 की है। इस साल यूपी के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह फिल्म सिटी स्थित एक स्टूडियो में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आए। वहां से उन्होंने कालिंदी कुंज पार्क का भी उद्घाटन किया था। कुछ महीने बाद वो भी किसी कारणवश मुख्यमंत्री पद से हट गए।
नारायण दत्त तिवारी
वीर बहादुर सिंह के बाद नारायण दत्त तिवारी यूपी के मुख्यमंत्री बने। वो भी नोएडा के सेक्टर 12 स्थित नेहरू पार्क का उद्घाटन करने वर्ष 1989 में आए थे। उसके कुछ समय बाद ही उऩकी भी मुख्यमंत्री पद की कुर्सी चली गई।
मुलायम सिंह यादव
वर्ष 1994 में नोएडा के सेक्टर 40 स्थित खेतान पब्लिक स्कूल का उद्घाटन करने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव आए थे। हैरानी की बात है कि मुलायम सिंह यादव ने मंच से कहा भी था कि मैं इस मिथक को तोड़ कर जाऊंगा कि जो मुख्यमंत्री नोएडा आता है उसकी कुर्सी चली जाती है। उनकी ये बात उलटी साबित हुई और कुछ महीने बाद ही वो भी मुख्यमंत्री पद से हट गए।
मायावती
मुलायम के बाद नोएडा का मिथक तोड़ने का साहस मायावती ने जरूर दिखाया। मगर उन्हें भी कुर्सी गंवानी पड़ी। 2011 में भी मायावती नोएडा आईं थी, लेकन 2012 के चुनाव में उनकी सत्ता छिन गई।
अखिलेश यादव
मुलायम सिंह और मायावती की तुलना में अखिलेश यादव ने साहस जुटाना तो दूर उन्होंने बतौर सीएम नोएडा की योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन तक यहां आकर करना ठीक नहीं समझा बल्कि यहां की हर योजना का उदघाटन उन्होंने लखनऊ से ही किया। हद तो तब हो गई जब राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के नोएडा जाने पर भी उनकी अगवानी के लिए खुद न जाकर उन्होंने मंत्री भेज दिए।
मगर क्या ये माना जाना सही है कि नोएडा आने से सभी मुख्यमंत्रियों की कुर्सी चली जाती है। जबकि हर मुख्यमंत्री के कुर्सी जाने का कारण अलग अलग है। इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि राजनितिक कारण था। जिसे अंधविश्वास का जामा पहना दिया गया। कम से कम इतने बड़े और जिम्मेदार पदों पर बैठ कर ऐसे अंधविश्वास को मानना और जनता को गुमराह करना तो बेवकूफी भरा है। इसके ठीक उलट योगी ने इस अंधविश्वास पर चोट करते हुए नोएडा शहर के पांच दौरे कर सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस मामले में तो विपक्ष को भी योगी से सीख लेनी चाहिए कि उन्होंने इस तरह के अंधविश्वास को नहीं माना।

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