उम्मुल खेर आईएएस का संघर्ष भरा सफर, अंत में हासिल कर ही ली सफलता

उम्मुल खेर आईएएस

उम्मुल खेर आईएएस केवल 28 साल की उम्र में 16 फ्रैक्चर और 8 सर्जरी का सामना कर चुकी है, क्योंकि उनको ऑस्टियो जेनेसिस नाम की एक बिमारी है। इस बिमारी में इंसान की हड्डियां काफी कमजोर होती है, और बहुत आसानी से टूट भी सकती है। लेकिन बावजूद अपनी बीमारी के उम्मुल ने अपने सपनों को पूरा कर दिखाया है।

राजस्थान में जन्मी उम्मुल खेर आईएएस जब 5 साल की थी, तब उनके घर के हालात काफी खराब थे। गरीबी के चलते पिता को दिल्ली आना पड़ा, जिसके बाद तीन भाई-बहनों और मां के साथ उम्मुल अकेले राजस्थान रहती थी। पिता के जाने के बाद उनकी मां को भी सीजोफ्रीनिया के दौरे पड़ने लगे। जिसके चलते मां की नौकरी भी चली गई। और उनके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी मुश्किल पड़ गया।

इसके बाद उम्मुल के पिता, मां और सभी बच्चों को अपने साथ दिल्ली ले गए। जहां वो फेरी लगाकर कमाई किया करते थे। दिल्ली आकर उम्मुल और उसका परिवार हजरत निजामुद्दीन की झुग्गी-झोपड़ी में रहने लगे।

उम्मुल 7वीं कक्षा में थी। तभी से झुग्गी के बच्चों को पढ़ाकर उन्होने 100, 200 रूपयें कमाना शुरू कर दिया था। बच्चों को पढ़ाने के साथ ही उम्मुल खेर आईएएस बनने का सपना भी देखने लगीं।

इसी दौरान कई बार उम्मुल की हड्डियां टूट चुकी थी। जिसके कारण उसके पिता ने उसे शारीरिक दुर्बल बच्चों के स्कूल अमर ज्योति कड़कड़डूमा में भर्ती करा दिया था। जहां किसी डोनर की मदद के चलते उम्मुल का एडमिशन 9वीं कक्षा में करा दिया गया। इसके बाद तो जैसे उम्मुल ने ठान ही लिया था, कि वो जो भी करेंगी सबमें पहला स्थान ही हासिल करेंगी।

दिल्ली आने के कुछ दिनों बाद ही उम्मुल की मां की मौत हो गई थी। मां की मृत्यु के बाद सौतेली मां ने भी उम्मुल के परिवार के साथ आकर रहना शुरू कर दिया। जिसके बाद घर के हालात और बिगड़ते चले गए। तब उम्मुल ने अलग रहकर पढ़ाई पूरी करने का फैसला किया।

उम्मुल त्रिलोकपुर में अलग रहने लगी और अपनी पढ़ाई के साथ-साथ उन्होने बच्चों को पढ़ाकर अपना सारा खर्च भी उठाया। कॉलेज की पढ़ाई से लेकर खाने-पीने, रहने तक सब उम्मुल ने अपने दम पर कर दिखाया है। और आज उन्होने अपना सपना भी पूरा कर लिया है

उम्मुल खेर ने आईएएस के नतीजों में 420वीं रैंक हासिल कर अपने संघर्षों पर विजय पाई हैं। इतना ही नहीं, अब वो जरूरतमंदों और संसाधन विहीन शारीरिक दुर्बलताओं से जूझ रही औरतों के लिए भी कुछ करना चाहती है। उम्मुल की कहानी ‘जहां चाह वहां राह’ का सीधा साफ उदाहरण पेश करती है।

 

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