कभी बेचा करती थी इमली, आज बन गई कवियित्री

कविताओं

मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन। इस गाने की इन पंक्तियों की तरह ही झारखंड की रहने वाली जसिंता केरकेट्टा ने भी सच में कामयाबी हासिल कर ली। उन्होने भी अपने मन में पूरा विश्वास रखा और कामयाबी हासिल करने में सफल हुई। आज जंसिता अपनी कविताओं के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी जानी जाती है। इनकी किताबों का विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है। इतना ही नहीं, आज जसिंता इटली, जर्मनी और स्विटजरलैंड में लोगों को लेक्चर दे रही है।

जसिंता की कविताओं में उनकी जिंदगी का दर्द झलकता दिखाई देता है। झारखंड के खुदपोस गांव की रहने वाली जसिंता कभी दो वक्त की रोटी के लिए भी हाट पर जाकर इमली बेचा करती थी। इतनी मुश्किलों के बावजूद भी वो मन लगाकर पढ़ाई किया करती थी। जहां एक ओर जंसिता में मन में कुछ बनने का विश्वास था। वहीं दूसरी ओर उसकी मां ने भी बेटी को आगे पढ़ाने की ठान ली थी। जंसिता की पढ़ाई जारी रखने के लिए उनकी मां ने अपनी जमीन को 7000 रुपयें में गिरवी रख दिया। और इन पैसो को लेकर जसिंता रांची चली आई। इसके बाद उन्होने सेंट जेवियर्स कॉलेज के मास कम्युनिकेशन में दाखिला लिया।

लेकिन पैसों की कमी होने की वजह से उन्होने वहां सुरक्षा गार्ड कंसल्टेंसी सेंटर में काम करना शुरू कर दिया। इतना ही नही, स्कूलों में अग्निशमन यंत्र भी बेचे। इसके बाद भी कई रात उन्होने भूखे पेट पढ़कर ही सोना पड़ा। हालात इतने बत्तर थे। लेकिन जंसिता ने कभी हार नहीं मानी जिंदगी की मुश्किलों का उन्होने हमेशा डटकर सामना किया।

और फिर जसिंता ने कविताओं को लिखना शुरू किया। जिसमें उन्होने आदिवासियों की जिंदगी, उनकी स्थिति, और उनके संघर्ष से लोगों को रूबरू करवाया। कई भाषाओं में उनकी कविताओं के संग्रह का अनुवाद हुआ। हालांकि, जसिंता के लिए यह राह आसान नहीं थी।

उनकी पहली किताब 2016 में आदिवाणी प्रकाशन थी। जो कोलकाता से हिंदी-अंग्रेजी में छपी गई थी। इसके बाद इस किताब को जर्मन के प्रकाशन द्रौपदी वेरलाग ने ग्लूट के नाम से हिंदी-जर्मन में पब्लिश किया। इस किताब की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए पब्लिशर्ज ने 2018 में इसे दोबारा छापा। गौरतलब, जसिंता से पहले झारखंड की किसी भी आदिवासी कवि की कविताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर एक साथ तीन भाषाओं में कभी पब्लिश नहीं किया गया था।

हाल ही में जसिंता केरकेट्टा इटली के तुरीनो शहर में शुरू 31वें इंटरनेशनल बुक फेयर के 10 मई के उद्घाटन समारोह में खास मेहमान बनकर पहुंची थीं। वहां उनकी कविता संग्रह की किताब अंगोर के इतालवी की चर्चा भी हुई। बता दें, कि  इस किताब को इतालवी प्रकाशन मिराजी ने प्रकाशित किया है। लेकिन खास बात तो ये है। कि जसिंता की इस किताब को एक नहीं बल्कि तीन भाषाओं में प्रकाशित किया गया है।

जसिंता को अब तक कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है। साथ ही, उनकी कविताओं का पंजाबी, उर्दू, गुजराती, मराठी, असमिया, कन्नड़,तमिल संथाली समेत कई भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है।

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